मैं मज़दूर हूँ
सब सह लूँगा
पहले भी था
मैं सड़क पर
अब भी रह लूँगा,
मैं किसान हूँ
मेहनत का सदा
हूँ पाला हुआ
मुझे महलों का
मोह नहीं-
कल भी तो था
झोंपड़े में
आज भी रह लूँगा,
रोजी-रोटी को मैं
जो घर से निकला
दर-बदर की
खाईं ठोकरें
तब दो निवाले
कमाकर पेट भरा,
कोरोना के कहर से
जो लोक-डाउन हुआ
मैं दाने-दाने को
फिर मोहताज हुआ
मैं कल भी लड़ा भूख से
आज भी लड़ लूँगा,
शहर वीरान हुए
रास्ते सब बंद
पाँवों में पड़ी बेड़ियाँ
मुझे घर पहुँचा दो,
दूर मेरा गाँव
बुलाता है मुझे,
दुआ में उठा हाथ
आँखों में भरे आँसू
राह निहारती है माँ
माँ से मिलवा दो,
कल भी थोड़े में था खुश
आज भी रूखी-सूखी खा लूँगा
बुलाता है मेरा गाँव
मुझे गाँव पहुँचा दो ।
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